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भारत की जाति व्यवस्था



 भारत की जाति व्यवस्था 

भारत यु तो महान देश हैं । पर इस देश की जाति व्यवस्थाने इसे बोहत पीछे रखा हैं। इसमे कई तरह की जातिया है ।पुराने जमाने मे भारत मे वर्णव्यवस्था हुआ करती थी औए इस देशको जाती व्यवस्थाने जितना नुकसान किया है, कोई और वजह ने नही किया। 

भारत मे चार वर्ण थे

  1. ब्राह्मण - पुजारी, शिक्षक एवं विद्वान
  2. क्षत्रिय – शासक एवं योद्धा
  3. वैश्य - किसान, व्यापारी
  4. शूद्र – मजदूर

वर्ण व्यवस्था बाद में जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गया और समाज में जन्म के आधार पर निर्धारित होने वाली 3,000 जातियां एवं समुदाय थीं जिन्हें आगे 25,000 उप जातियों में विभाजित किया गया था। 

देश में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति से संबंधित कई सिद्धांत हैं। जबकि इनमें से कुछ सिद्धांत ऐतिहासिक हैं, कुछ धार्मिक या जैविक हैं। जाति व्यवस्था पर कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत सिद्धांत नहीं है।

प्राचीन हिंदू धार्मिक पुस्तक ऋग्वेद के अनुसार, “मानव जाति का निर्माण पुरुष ने स्वयं को नष्ट करके किया था। विभिन्न जातियों या वर्णों को उसके शरीर के विभिन्न हिस्सों से बनाया गया है । ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मणों को उनके सिर से बनाया गया था, क्षत्रियों की उत्पत्ति उनके हाथों से हुई थी, वैश्य ने अपनी जांघों से और उनके पैरों ने शुद्र बनाया था.”

पुराने वर्णों का स्थान अब जाति ने ले लिया हैं भारत मे कई तरह की कई जातिया हैं  आज भारत के कई गाँवो में अभी भी वही व्यवहार। हैं लोग साथ मे बैठकर खाना नही खाते

और इन लोगो को भी कोई प्रश्न नही होता कि हम ही ऐसे क्यू है ? हमें नीची जातिका क्यो माना गया हैं ? अगर वे लोग सोचे तो क्रांति हो सकती हैं 

दूसरा की अंतरजातीय विवाह ही इस सिस्टम को तोड़ सकता हैं। इसीलिए हमें इसको बढ़ावा देना चाहिए।

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